" काव्यांजलि
की कई कविताएँ पढ़ी, ' विश्वास के फूल ' - कविता एक नया मनोबल पैदा करती है, बिल्कुल
वीर रस की कविता की तरह। ' ज़िन्दगी हुई मरुस्थल ' - पढ़कर ऐसा लगा जैसे कवियत्री खुद
मरुस्थल की शाम की गवाह रही हो। Gender Equality पर लिखी कविता सामायिक मुद्दे को उठाती
है, प्रेरित करती है। ' तरुमित्र ' कविता पढ़कर दिलचस्पी पैदा हुई है, अगर वाकई ऐसा
है, तो खूबसूरत है और घूमने योग्य है। ' जीवन का रहस्य ' कविता जीवन की सच्चाई बताती
है। ' तुम कहते हो कविता ' रिश्ते के बंधन मुक्त होने की याद दिलाती है। ' पूज्य भाई
शंकर दयाल की पावन स्मृति ' में लिखी गयी कविता
मनुष्य की कल पर जीत है। संग्रह बहुत बढ़िया है , जीवन की इस व्यस्तता मैं आज बहुत
दिनों बाद कुछ अच्छा पढने को मिला. प्रूफ रीडर या पब्लिशर की गलती से कहीं-कहीं वर्त्तनी
गलत हो गयी है, लेकिन उससे कोई फरक नहीं पड़ता क्यूँकि गंगा की बहती अविरल धारा में
कविताएँ पाठक को डुबो देती हैं। किताब के लिए धन्यवाद।"
Friday, 27 July 2012
Saturday, 16 June 2012
कौन सी आग है बड़ी?
बरस रही थी आग,
सड़कों से लोग गए थे भाग ।
छाई थी शमसान सी निस्तब्धता,
भीषण लू और गर्मी का था,
चारो ओर साम्राज्य।
घरों के अन्दर ए. सी में बैठ कर ठंडी हवाओं के बीच थी गहमागहमी -
होगा अगला राष्ट्रपति कौन ?
छन रहे थे पुए और पकवान,
बन रहा था पुलाव।
वहीँ दूसरी ओर -
इसी तपिश में,
पेड़ों के नीचे दुबके थे -
रिक्शाचालक, मजदूर और किसान,
अपनी पेट की आग बुझाने को।
नंगी तस्वीर थी भूखी माँ की,
थे चिथड़ों में लिपटे बच्चे -
जो कई शाम से थे निराहार ।
महंगाई की मार ने दी कमर तोड़ ।
हमे और आपको लगी थी चिंता,
सुखाने की पसीनों की ,
और उन्हें थी चिंता पसीना बहाने की ।
उन बेचारों को था इंतज़ार मुसाफिरों की , कामों की , पैसा कमाने की ।
ताकि बुझा सके पेट की गर्मी को, अपने-अपने परिवारों की,
पूछना है आपसे एक सवाल -
बाहर की गर्मी है बड़ी या उससे भी बड़ी है पेट की आग?
Tuesday, 12 June 2012
हमारा राष्ट्रपति कैसा हो?
दिखाया आपने सच्चाई का वो रास्ता,
जिस पर चलने से होती है हमारे राजनेताओं का हाल खास्ता।
२१वीं सदी के सबसे बड़े लोकतंत्र का राष्ट्रपति -
भारत का प्रथम नागरिक हो कैसा ?
किया है आपने पुरातन काल को उजागर,
जहाँ थे आदर्शवाद के सुचालक,
नेहरु, राजगोपालाचारी, बल्लभ भाई पटेल।
पर क्या इस तरह चलती थी विवादों से भरी उनकी रेल?
मर्यादा बंधी होती थी उनके आखोँ के पानी के बीच ।
अंतरात्मा की आवाज़ पर बनते थे वोट।
"इमर्जेनसी क्या सच क्या झूठ" के लेखक को गँवानी पड़ी अपनी जान,
कहने की ज़रुरत नहीं आपको,
जानते हैं तब से अब तक का इतिहास ।
सच कहूँ !
विषैले साँप भी इतने विषधर नहीं,
जितनी है राजनीति मैं आज विषैली हमारी सोंच।
होती है बात गाँधी, राजेंद्र, लाल बहादुर, वेंकट रमण, कलाम की ।
सेवा, अर्पण, और समर्पण था जिनका अस्त्र ।
आज आईने में देखे हम सभी खुद को चिढ़ाता है अपना ही चेहरा,
सभ्यता, संस्कृति खोती जा रही है ,
हर क्षण मानव मूल्य और मानवता दे रहा है चेतावनी,
करो मानव मूल्यों की रक्षा -
तभी होगी देश सेवा,
आत्मविश्लेषण, आत्मविवेचन, आत्ममूल्यांकन कर,
उन्हें चुनना हैं भावी कर्णधार को,
जो हमारे देश को बचाएँ डूबता मझधार से
ईश्वर से है- अनंत विनती, प्रार्थना, अर्चना, वंदना,
मिले भारत को एक आदर्श राष्ट्रपति।
आएगा ज़रूर एक नया निजाम
भेजा है आपने एक पैगाम
दुनिया को ज़रुरत है एक नए निजाम का सलाम ।
जो सिखाये सबक - आत्मक्रांति की,
जो पढाये पाठ श्रम, मानवसेवा की ,
और सुशक्ति के बल पर चलाये समाज को ।
जो गिनाये गिनती -
असफलताओं से भरे समाजसेवी रूपी गणितग्यों की ।
जो घुमाये अपने को विकसित कहने वाले देशों की ,
नर कंकालों से भरी हैं खोखली संस्कृति जिनकी,
कहलाने को हैं साम्राज्यवाद , पूंजीवाद, लोकतंत्र के पोषक -
जो खिलने नहीं देते, फूलने नहीं देते , रुपये के मूल्य को ।
मुद्रास्थिति का गुज़रता दौर ,
फैला हैं विश्वरूपी बाज़ार में ।
बजा रहा है खतरे की घंटी ,
भारत की अर्थव्यवस्था रही है लड़खड़ा ।
लेखक ने किया है इसे उजागर ,
उनकी जागरूकता के हैं हम शुक्रगुजार ।
पर हूँ, पूर्ण विश्वस्त आएगा सतयुग,
जो देगा हमें एक नया निजाम ।
Sunday, 10 June 2012
आईना झूठ नहीं बोलता, दिल का हाल खोलता है
जी हाँ ! जो आपके चेहरे पर रंग नहीं जमाता -
शक्ल ख़राब दिखलाई देती है
उस आईने को चकनाचूर कर देते है आप ।
कल जो आईना आपने तोड़ा,
वे आपके चेहरे में असंतुलन बता रहा था।
लोग कहते रहे
दोष आईना का नहीं - आपका है -
आपकी दृष्टि का है।
लोग आपको वास्तविकता से अवगत कराते रहे
पर आप अपनी जिद्द पर अड़े रहे।
आपने एक साल में ही दस आईने बदलने का नया रिकॉर्ड कायम कर दिया ,
नए आईने भी आपको संतुष्ट नहीं कर सके,
सलवटों से भरा चेहरा और भी डरावना दिखाई दिया -
परन्तु आपको कतई पसंद नहीं कि
आईना आपको डराए।
आपने फिर उस आईने को कूड़ेदान में डाल दिया ।
हमने आपको बार -बार समझाया
आईना झूठ नहीं बोलता,
आप आईना बदलते रहे ।
आईना रखने की आदत छूटेगी नहीं
कारण हर क्षण आप उसमें
अपना सुन्दर चेहरा ही देखना चाहते है -
आदत है बचपन की -
आत्ममुग्ध होना, प्रशंसा सुनने की चाहत है।
किन्तु आईना तो आईना है -
मनपसंद रूप को देख कैसे झूठ बोल सकता है?
खुश रहना आपकी आदत है ।
जो आईने आपको चिढ़ाते हैं,
आप उन्हें तत्काल बदल देते हैं।
आपने कभी नहीं सोचा कि आप अपनी सूरत और सीरत को बदलें -
बदलते हैं तो केवल आईना!
पर यह हमेशा याद रखें -
आईना कभी झूठ नहीं बोलता
Saturday, 26 May 2012
मातृ- पितृ देवो भव:
विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है । भारतीय संस्कृति में माता पिता को सर्वोपरि माना गया है । हमारे भारतीय धर्मशास्त्रों में माता को प्रथम स्थान, पिता को द्वितीय, तत्पश्चात गुरु का स्थान है । गुरु को गोविन्द से भी बड़ा कहा गया है, परन्तु अब समाज के बदलते आधुनिक परिवेश एवं आधुनिकता के रंग में रंगी हुई लोक प्रवृति माता - पिता के महत्तव को नही समझती है । आज अधिकतम परिवारों में उनकी अपेक्षा की जाती है । अधिकांश परिवारों में वृद्ध माता पिता दीन - हीन अवस्था में रह रहे हैं । आज परिवार व समाज में उनका कोई सम्मान नहीं है।
पुत्रों द्वारा उनको तरह तरह से यातना दी जाती है, अपमानित किया जाता है। बच्चे यह नहीं सोचते की कल उनकी भी ऐसी ही दशा होगी । माता पिता अपना सर्वस्व उनपर लुटा देते हैं। जीवन भर की अपनी कमाई, अपना समय, अपनी सोच , चिंतन , आराम को उनपर न्योछावर कर देते हैं। वे अपना तन-मन-धन अपने पुत्र पुत्रियों की पढ़ाई -लिखाई शादी विवाह पर खर्च कर देते हैं। उनके द्वारा अर्जित उनकी जीवन भर की कमाई एवं संपत्ति उनके पुत्रों द्वारा अधिकार कर उनको इतना कमज़ोर एवं नि:सहाय बना दिया जाता है कि वे अपना जीवन यापन भरण -पोषण भी नहीं कर पाते । असमर्थ हो दर-दर की भीख मांगने पर विवश हो जाते हैं और और यह उस समय होता है जब वे पूर्णरूप से शारिरिक , मानसिक तथा आर्थिक रूप से अस्वस्थ एवं कमज़ोर हो जाते है। प्रश्न विचारणीय है की क्योँ ऐसा? व्यक्तिपरक समाज को कहाँ ले जा रहा है? हम कहते हैं कि हम विकसित विश्व और समाज के विकासशील मनुष्य है ? फिर अपनी ही जड़ को अपने ही हाथों से क्यों काटते है? संविधान और अदालत - माँ और बाप ? कैसी विडम्बना है, जो अपने ही जनक और जानकी को कटघरे पर खड़ा होने पर मजबूर करती है।
माता पिता की अपेक्षा करने पर क़ानूनी तौर पर अदालत मैं खड़ा किया जा सकता है। भारत सरकार द्वारा मेन्टेनेन्स एंड वेल्फेर ऑफ़ परेंट्स एंड सिनियर सिटीज़न एक्ट 2007/56 दिसंबर 2007 की लोक सभा मैं पारित किया गया है। सरकार ने कदम उठाया, जो प्रशंसनीय है। पिता की अपेक्षा करने वाले उत्तराधिकारी पुत्र पुत्रियों के लिए जो संविधान पारित हुआ वह माता-पिता का रक्षक ही नहीं है, भारतीय संस्कृति, परम्परा एवं "मातृ- पितृ देवो भवो" का संवाहक है। ह्रदय मे बात चुभती है - फिरभी क्या करें "बिन भय होत न प्रीति" वाली कहावत चरितार्थ होती है। माता-पिता की उचित देख भाल भरण पोषण नहीं करने वाले पुत्र पुत्रियों को प्राधिकरण में ले जाया जा सकता है, शिकायत दर्ज की जा सकती है। यदि माता-पिता प्राधिकरण में जाने तक असमर्थ हैं तो किसी दुसरे माध्यम से शिकायत को जिलाधिकारी अथवा जनपद न्यायालय मैं पंहुचा सकते हैं। सूचना एवं जानकारी के लिए यह ध्यातव्य रहे कि यह प्राधिकरण प्रत्येक जिले में स्थापित किया गया है, देख-रेख स्वयं जिलाधिकारी एवं जनपद न्यायाधीश करते हैं।यह प्राधिकरण सामान्य रूप मे परिवार अदालत के नाम से जानी जाती है। इसके सदस्य भी प्राय: वरिष्ट नागरिक ही होते है। इस कानून के अतिरिक्त प्राधिकरण उत्तराधिकारियों को एक नोटिस भेजकर प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित होने का आदेश देता है। यदि परिवादी नोटिस मिलने के बाद भी इसकी अवहेलना करता है तो प्राधिकरण उन्हें दंडित व जुर्माना देकर जेल भी भेज सकता है। जुरमाना तथा जेल की अवधि की सीमा प्राधिकरण के विवेक पर है। यदि उत्तराधिकारी विदेश में रहता है तो यह कानून उसके लिए वहाँ भी लागू होगा और उनकी संपत्ति ज़ब्त की जा सकती है।
कानून के अंतर्गत माता-पिता या वृद्ध -वृद्धा की याचिका के अनुसार उनके उत्तराधिकारी उनको मेन्टेनेन्स देने को बाध्य होंगे। इसका निर्धारण याचिका की पृष्ठभूमि के अनुसार किया जायेगा । इस सम्बन्ध में प्रत्येक राज्य सरकार मैं दिशा निर्देश भी स्पष्ट कर चुके हैं। यदि किसी वृद्ध के एक से अधिक उत्तराधिकारी है, तो यापन का जीवन यापन का खर्च सभी उत्तराधिकारीयों को सामान रूप से देना होगा। कानून अपनी जगह है । हम आत्मनिरीक्षण, आत्मविवेचन, आत्ममूल्यांकन करें, क्या कानून की ज़रुरत पड़नी चाहिए? सुबह का भूला शाम को घर आ जाता है, तो हम उसे भूला नहीं कहते। हम अपने वृद्ध माता-पिता के महत्व को समझें । उनकी अधिक से अधिक सेवा करके उनको प्रसन्न करें , उनके आशिर्वाद भरे हाथ हमारे मस्तक पर हों, उनका अचल ज्ञान और अनुभव हमारा पथ- प्रदर्शन करे।
"सुत मित नारी भवन परिवारा,
होहिं जाहिं जग बारहिं बारा,
मिलहिं न जग में जीवन दाता,
मात पितु जन सहोदर भ्राता ।"
हमारे माता-पिता ठीक उस बरगद के वृक्ष के समान हैं जहाँ सैंकड़ो पक्षी रूपी रिश्तेदार , उनके प्रेम रूपी छाया में आकर अपना आश्रय पाते हैं । संयुक्त परिवार में न केवल संस्कार पाए जाते हैं, अपनत्व , सूझ -बूझ व सामाजिक आचरण की शिक्षा भी मिलती है। अभी हाल में भारितीय समाज ने संयुक्त परिवार के महत्व को समझा है । भारतीय संस्कृति “वसुधेव कुटुम्बकम” के सुन्दर आदर्शों पर आधारित है।
Saturday, 28 April 2012
माँ-बाप क़दमों की धूल नहीं, माथे की शान
रातों
की रात जिसने बिताया तेरे साथ,
कर
दिया तुमने उन्हें अपने से अलग, हाथों हाथ।
तेरी
एक-एक मुस्कानों के लिए,
कर
दिया जिन्होंने जीवन अपना न्योछावर।
करते
रहते हो अपने ही मुस्कानों की बात।
पूछते
नहीं मरते या जीते हैं वो -
सर्वस्व
लुटाकर भी सिल लिया है -
जिन्होंने
अपने होठों को हर बार ।
लौटकर
जाते नहीं दरवाज़ों पे उनके -
मरे
या जीते हैं, या उनकी लाश ।
मरने
के बाद देते हो श्रद्धांजलि -
यह
हैं हास्यास्पद बात ।
श्रद्धांजलि
देकर, है क्या फायदा?
अरे
! जीते जी पूछे नहीं - दुःख-सुख, दवाइयाँ और कपड़े ।
अनांजलि
भी देकर, कीजिये ज्यादा सेवा ।
ईश्वर
लेगा हिसाब,पूछेगा -
तुमने
किया नहीं सेवा का वायदा पूरा।
शर्म,
हया है दिया बेच।
कचोटती
नहीं आत्मा -
देते
हुए श्रद्धांजलि -
जब
तक जीवित थे माता-पिता,
तब
तक तो दिया तिलांजलि ।
फोटो
को पहनाते हो हार ,
गर्म
करते हो दिखावे का बाज़ार।
देते
हो पुष्पांजलि -
माता-पिता
मरे नहीं - यह कहो ही नहीं,
यह
मत करो, और न लगाओ बाह्यड म्बर
की झड़ी।
माँ-बाप
मरने के बाद जला दिए गए,
गंगा,
जमुना, नर्मदा के घाटों पर,
बहा
दी गयीं अस्थियाँ हरिद्वार और वाराणसी में,
किया
जमकर श्राद्ध,
लुटाया
करोड़ों की संपत्ति,
सेवा
न कर, दिया दिखावे भरी फूलों की श्रद्धांजलि ।
हुए
झंझट से मुक्त,
पर
सोचना आएगी तेरी भी ये घड़ी।
तुम्हारे
पूर्वजों के संस्कार,
दे
रहे हैं चेतावनी -
कर
रहीं हैं उनकी आत्माएं गुहार,
जागो
! जागो !
मानव
जाति पहली बार
गुजर
रहा है संक्रांति के समर से,
माता-पिता
की आत्मा को दुखानें से होता नहीं,
घर
में सुख शांति का सबेरा,
करो
दूर अपने मन का अँधेरा,
भौतिकवादी
युग की चमक में,
अपने
को न बेचो ,
टूट
जाएगा वेद पुराणों का विश्वास,
आत्मा
उनकी मरती नहीं,
जलता
है केवल शरीर।
कर
उनकी अटूट सेवा,
भरो
अपने मन में श्रद्धा, प्रेम और विश्वास,
और
ले लो उनका कोटिश: आशीर्वाद।
Saturday, 21 April 2012
कब होगा वो दिन
बिहार, हाँ बिहार को लेकर सपना है मेरे मन में,
यह भी है मालूम-सपने सदा पुरे नहीं होते।
यह सिर्फ बिहार कि बात नहीं -
पुरे हिंद और हिंदुस्तान कि बात है।
है मन के अन्दर टीस जो हर क्षण बेधता है,
हम चहुंमुखी विकास कि बात करते हैं
हमने सड़कों को तो बना दिया -
शिक्षा को आगे बढ़ा लिया -
बहुत अविकसित क्षेत्र, हमारी योजनाओं में हैं- पर क्या?
हमने अपनी , मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में
क्या कभी सपनों में भी सोचा?
विकसित राज्यों कि श्रेणियों में हमारी गिनती हो रही है ,
पर हमारी अस्मिता अन्दर ही अन्दर रो रही हैं।
सच कहूँ! दिए तले अँधेरा हैं।
तामस कि इस रात ने रोशनी कि बहुत ज़रुरत है ।
विक्रमशिला, नालंदा, वैशाली- सहमे-सहमे खड़े हैं।
गाँधी का सपना अधूरा है - हम अंग्रेजियत का लबादा लादे,
अपने को विकसित और आधुनिक बताते हैं।
सच कहूँ- भेजते हैं बेटे-बेटियों को कॉन्वेंट में,
कारण उनके करियर से कर नहीं सकते खिलवाड़।
ऊँची कुर्सी कि ललक और पहुँच,
हमें पहुचाती है अंग्रेजी के दरबार में।
हमें अंग्रेजी से कोई लड़ाई नहीं!
भाषा तो भाषा है ।
रामू, महेश, सुखिया, मुनिया, रमेश्री की आँखों में
एक सवाल हैं - हम कहाँ खड़े होंगे जहाँ हमारी भाषा ही नहीं।
कब होगा वो दिन जब रूस, जापान की तरह एवं अन्य स्वभाषा भाषी देशों की तरह,
बंगाल, तमिल नाडू राज्यों की तरह,
हमारा हिंदुस्तान भी अपनी भाषा में बोलेगा?
पहुँचाना है हम सभी को जन-जन तक ये सन्देश- करो अपनी भाषा का मान,
और हिंद और हिंदुस्तान बनाएं अपनी एक पहचान।
हिंदी और हम
हिंदी का प्रश्न राष्ट्रीयता और अस्मिता का प्रश्न हैं। इसमे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। अक्सर मैं कहती हूँ हिंदी की गाड़ी रह रह कर आगे से पीछे की और सरकने लगती हैं, या फिर चलते चलते दल दल में धँसने लगती हैं। ऐसा क्योँ होता हैं? इसलिए कि हमारे अन्दर न तो स्पष्टता है, और न ही संकल्प। फल यह हैं कि हम भँवर में फँस चुके हैं । भारतीय संविधान कि धारा ३४६ में स्पष्ट रूप से कहा गया है --
"संघ की राष्ट्र भाषा हिंदी और देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले हिंदी अंको का रूप भारतीय अंको का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा" जो - हमें रह रह कर मुंह चिढ़ाता रहता हैं।
आज वस्तुस्थिति यह हैं कि जहाँ हिंदी हैं वहाँ क्षेत्रीयता के जीवाणु कणों ने अपनी जड़ जमा ली हैं । इन बातो में विशेष नहीं जा कर, यहाँ में हिंदी के उस रूप को प्रदर्शित करना चाहूंगी, जिसे मैंने कई युगों पूर्व विश्व हिंदी सम्मेलनों के द्वारा जाना था। पिछले दिनों के सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता हैं, हमारे देश में अंग्रजी बोलने वालों की संख्या १२.५३ करोड़ है । हिन्दीभाषी (५.१३ करोड़) दुसरे नंबर पर हैं। यह भी ज्ञात है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ग्रेट ब्रिटेन कि जनसंख्या से दुगनी है । जब हमारे यहाँ ग्रेट ब्रिटेन के लोगों से दुगने अंग्रेजी बोलने वाले हैं , तब अंग्रेजी के कारोबार को भी तेज़ी से बढ़ना चाहिए, जैसे कि अंग्रेजी अख़बार, सिनेमा, टीवी चैनल, किताबें आदि, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सर्वेक्षण भारतीय जनगणना २०११ के आकड़ों पर आधारित है । इससे यह ज्ञात होता हैं कि देश में कितने लोग एक से लेकर तीन भाषाएँ बोलते हैं । यह अंग्रेजी को ध्यान में रख कर किया गया हैं इसलिए यहाँ अंग्रेजी कि विशेषता दिखलाई पड़ती है। हम यह देख रहे हैं कि देश में हिंदी बोलने वालों कि संख्या से चार गुनी, इंग्लैंड के लोगों से आठगुनी, और अमेरिका कि आबादी से दुगनी है । जनगणना आकड़ों के अनुसार २०११ में हिंदी को अपनी भाषा बताने वालो कि संख्या ४२.२ करोड़ थी, यानि १३ करोड़ लोग इसमें गैर हिंदी भाषी और जुड़े जो हिंदी बोल पाते थे। हिंदी का सरप्लस अंग्रेजी के टोटल के बराबर है। अभी हमने ५.२ करोड़ उर्दू भाषियों को रखा ही नहीं। वस्तुत वह हिंदी ही बोलते हैं । अंग्रेजी की शक्ति और महत्ता अस्वीकार नहीं हैं, उसकी जहाँ ज़रुरत हैं उसका उपयोग हो पर हम यह सोचे कि हिंदी या हमारे देश कि जीवित अन्य भाषाएँ मर जाए और अंग्रेजी विश्व भाषा बनकर उभरें तो यह गलत सोच होगी। विश्व हिंदी सम्मेलनों में भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने मत दिए, हिंदी की सिफारिश की, लेकिन आज बात फिर वही ढाक के तीन पात वाली चरितार्थ हुई।
स्मृतियों का पन्ना खुलना चाहता हैं - स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की वो छात्रा, शशि - जिसे बाबा बुल्के का सानिध्य प्राप्त था। अपने आपको धन्यतिधन्य समझती थी और भिन्न भिन्न सरकारी सेवाओं को छोड़ अपने आप को हिंदी हतु समर्पित कर दिया था , पर आज? आज हमें आज़ादी मिल गयी है , लोकतंत्र बहल हो गया है , लेकिन कैसी आज़ादी और कैसा लोकतंत्र? जब हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए है इसकी अस्पष्ट जवाबदेही सरकार और राजनेताओं पर है जिसके कारण यह राष्ट्रभाषा का प्रश्न अनुत्तरित है
२५ अगस्त १९४६ को महात्मा गाँधी ने कहा "मेरी मातृभाषा में खामियाँ क्योँ न हो मैं इससे उसी तरह चिपटा रहूँगा जैसे बच्चा अपनी माँ से रहता है। माँ उसे जीवनदायिनी दूध दे सकती है । अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी हकदार वह नहीं है तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा। वह कुछ लोगों के सिखने की चीज़ हो सकती है, लाखों करोड़ों की नहीं।" महात्मा गाँधी के प्रयत्न से ही १९३५ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने हिंदी भाषा को स्वीकार किया। कमेटी ने कहा " अगर कोई वक्ता हिन्दुस्तानी न जानता हो या आवश्यकता पड़ने पर तो अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल कर सकता है । कमेटी की कारवाही की भाषा हिंदी ही होगी।"
महात्मा गाँधी के अनुसार राष्ट्रभाषा का पद ग्रहण करने के लिए निम्नांकित गुणों का होना आवश्यक हैं -
१. यह भाषा सरकारी नौकरी के लिए आसन हो ।
२. उस भाषा मैं भारत के धार्मिक, आर्थिक, और राजनितिक कामकाज हो सकना संभव हो सके\
३. उस भाषा को देश के ज़्यादातर लोग बोलते हो।
४. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो।
५. उस भाषा का विचार करते हुए क्षणिक या कुछ समय तक रहनेवाली, स्थिति पर जोर नहीं दिया जाए। उपयुर्क्त गुण हिंदी में हैं।
१४ सितम्बर १९४९ को हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल गया। तब से अब तक का पुनरावलोकन किया जाये तो ज्ञात होता है, कि हम दूसरी भाषा के व्यामोह में इस तरह फँस चुके हैं, कि हमारी अपनी मौलिकता रही ही नहीं। अंग्रेजी स्कूलों और भाषा के नीचे हमारी आत्मा गिरवी हो गयी है। हम अमावस्या के अन्धेरे में टार्च कि रौशनी में अपनी, सभ्यता और संस्कृति को ढूँढ रहे हैं।
"आज आवश्यकता है किसी ऐसे नेता की, जो तुर्की के मुस्तफा कमालपाशा की तरह कह दे कि, समझ लो कल से सिवा तुर्की के कोई भी भाषा इस देश मैं हैं ही नहीं, और कोई भी चौबीस घंटे के बाद विदेशी भाषा का प्रयोग सरकारी कामकाज में करेगा तोह उसकी उन उँगलियों को कुतर दो, जिससे वह कागज़ पर आइन्दा कलम नहीं चला सके।" भारत में ठीक इसकी ज़रुरत है। बिना इसके न तो हमारी राष्ट्रीयता उभरेगी और ही राष्ट्रीय एकता संभव हैं।
जब बिहार में चुनाव हो रहा था तो राजनेताओं से अपील कि गयी थी कि वह बिहार के विकास में भाषा के विकास पर भी ध्यान दें। राजनेता जीत कर खुशियों के गीत गा रहे हैं और इस जीत को जनता कि जीत बता रहे हैं, बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हैं। विकास का अगला चरण शिक्षा, स्वास्थ्य, और सफाई से है। भारत के एक नागरिक होने के नाते और ४० वर्षो के मेरे अनुभव ने बार-बार मुझे झकझोरा है । मैंने बार-बार सोचा है कि हम अपने भाषा के प्रति इतने उदासीन क्योँ हैं? भारतेंदु के ''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,-बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल" वाली उक्ति कहाँ खो गयी है?
जिस राष्ट्र कि अपनी भाषा नहीं वह राष्ट्र गूंगा ही तो है। हिंदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है, कि इसके पास महात्मा गाँधी या बाबु पुरुषोत्तम दास टंडन के समान कोई नेता नहीं जो हिंदी कि गाड़ी को आगे बढ़ा सके साहस के साथ कह सके कि अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना हिंदी से प्रेम करना देश-प्रेम करना है। हिंदी अपेक्षाकृत बड़े भोगोलिक क्षेत्र की भाषा है। पुरे समाज की अस्मिता उससे व्यक्त होती है। ज्ञान और विचार कि कुर्सी से हिंदी को धक्का न दें। डॉक्टर फादर कामिल बुल्के, विदेशी होकर भी स्वदेशी , भारतीय। भारत की आत्मा में समाए हिंदीसेवी। मन में एक टीस है, दर्द है, अपने ही घर में हिंदी बंदिनी कि तरह कैद है , और दूसरी भाषा चिढ़ा -चिढ़ा कर कह रही है , समाप्ति की ओर है। हिंदी के अख़बार भी उदासीन हैं। सच माने, फ़िल्मी दुनिया, दूरदर्शन न रहे तो हिंदी कि स्थिति मूक, टुकुर-टुकुर ताकनेवाली उस लड़की के सामान होगी, जो थैला टांगे कचरे में से सामान चुन रही हैं। मेरी आँखें, मन-मस्तिष्क उस बाज़ार के लोगों पर टिकी हैं, जो अपनी आत्मा को बेच, व्यवसायीकरण एवं अपनी अहमियत को जीवित रखने के लिए पर भाषाओँ का दंभ भरते हैं। वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजी के संसार में हिंदी का आकाश होगा, पर कब होगा वो दिन?
"संघ की राष्ट्र भाषा हिंदी और देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले हिंदी अंको का रूप भारतीय अंको का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा" जो - हमें रह रह कर मुंह चिढ़ाता रहता हैं।
आज वस्तुस्थिति यह हैं कि जहाँ हिंदी हैं वहाँ क्षेत्रीयता के जीवाणु कणों ने अपनी जड़ जमा ली हैं । इन बातो में विशेष नहीं जा कर, यहाँ में हिंदी के उस रूप को प्रदर्शित करना चाहूंगी, जिसे मैंने कई युगों पूर्व विश्व हिंदी सम्मेलनों के द्वारा जाना था। पिछले दिनों के सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता हैं, हमारे देश में अंग्रजी बोलने वालों की संख्या १२.५३ करोड़ है । हिन्दीभाषी (५.१३ करोड़) दुसरे नंबर पर हैं। यह भी ज्ञात है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ग्रेट ब्रिटेन कि जनसंख्या से दुगनी है । जब हमारे यहाँ ग्रेट ब्रिटेन के लोगों से दुगने अंग्रेजी बोलने वाले हैं , तब अंग्रेजी के कारोबार को भी तेज़ी से बढ़ना चाहिए, जैसे कि अंग्रेजी अख़बार, सिनेमा, टीवी चैनल, किताबें आदि, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सर्वेक्षण भारतीय जनगणना २०११ के आकड़ों पर आधारित है । इससे यह ज्ञात होता हैं कि देश में कितने लोग एक से लेकर तीन भाषाएँ बोलते हैं । यह अंग्रेजी को ध्यान में रख कर किया गया हैं इसलिए यहाँ अंग्रेजी कि विशेषता दिखलाई पड़ती है। हम यह देख रहे हैं कि देश में हिंदी बोलने वालों कि संख्या से चार गुनी, इंग्लैंड के लोगों से आठगुनी, और अमेरिका कि आबादी से दुगनी है । जनगणना आकड़ों के अनुसार २०११ में हिंदी को अपनी भाषा बताने वालो कि संख्या ४२.२ करोड़ थी, यानि १३ करोड़ लोग इसमें गैर हिंदी भाषी और जुड़े जो हिंदी बोल पाते थे। हिंदी का सरप्लस अंग्रेजी के टोटल के बराबर है। अभी हमने ५.२ करोड़ उर्दू भाषियों को रखा ही नहीं। वस्तुत वह हिंदी ही बोलते हैं । अंग्रेजी की शक्ति और महत्ता अस्वीकार नहीं हैं, उसकी जहाँ ज़रुरत हैं उसका उपयोग हो पर हम यह सोचे कि हिंदी या हमारे देश कि जीवित अन्य भाषाएँ मर जाए और अंग्रेजी विश्व भाषा बनकर उभरें तो यह गलत सोच होगी। विश्व हिंदी सम्मेलनों में भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने मत दिए, हिंदी की सिफारिश की, लेकिन आज बात फिर वही ढाक के तीन पात वाली चरितार्थ हुई।
स्मृतियों का पन्ना खुलना चाहता हैं - स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की वो छात्रा, शशि - जिसे बाबा बुल्के का सानिध्य प्राप्त था। अपने आपको धन्यतिधन्य समझती थी और भिन्न भिन्न सरकारी सेवाओं को छोड़ अपने आप को हिंदी हतु समर्पित कर दिया था , पर आज? आज हमें आज़ादी मिल गयी है , लोकतंत्र बहल हो गया है , लेकिन कैसी आज़ादी और कैसा लोकतंत्र? जब हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए है इसकी अस्पष्ट जवाबदेही सरकार और राजनेताओं पर है जिसके कारण यह राष्ट्रभाषा का प्रश्न अनुत्तरित है
२५ अगस्त १९४६ को महात्मा गाँधी ने कहा "मेरी मातृभाषा में खामियाँ क्योँ न हो मैं इससे उसी तरह चिपटा रहूँगा जैसे बच्चा अपनी माँ से रहता है। माँ उसे जीवनदायिनी दूध दे सकती है । अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी हकदार वह नहीं है तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा। वह कुछ लोगों के सिखने की चीज़ हो सकती है, लाखों करोड़ों की नहीं।" महात्मा गाँधी के प्रयत्न से ही १९३५ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने हिंदी भाषा को स्वीकार किया। कमेटी ने कहा " अगर कोई वक्ता हिन्दुस्तानी न जानता हो या आवश्यकता पड़ने पर तो अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल कर सकता है । कमेटी की कारवाही की भाषा हिंदी ही होगी।"
महात्मा गाँधी के अनुसार राष्ट्रभाषा का पद ग्रहण करने के लिए निम्नांकित गुणों का होना आवश्यक हैं -
१. यह भाषा सरकारी नौकरी के लिए आसन हो ।
२. उस भाषा मैं भारत के धार्मिक, आर्थिक, और राजनितिक कामकाज हो सकना संभव हो सके\
३. उस भाषा को देश के ज़्यादातर लोग बोलते हो।
४. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो।
५. उस भाषा का विचार करते हुए क्षणिक या कुछ समय तक रहनेवाली, स्थिति पर जोर नहीं दिया जाए। उपयुर्क्त गुण हिंदी में हैं।
१४ सितम्बर १९४९ को हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल गया। तब से अब तक का पुनरावलोकन किया जाये तो ज्ञात होता है, कि हम दूसरी भाषा के व्यामोह में इस तरह फँस चुके हैं, कि हमारी अपनी मौलिकता रही ही नहीं। अंग्रेजी स्कूलों और भाषा के नीचे हमारी आत्मा गिरवी हो गयी है। हम अमावस्या के अन्धेरे में टार्च कि रौशनी में अपनी, सभ्यता और संस्कृति को ढूँढ रहे हैं।
"आज आवश्यकता है किसी ऐसे नेता की, जो तुर्की के मुस्तफा कमालपाशा की तरह कह दे कि, समझ लो कल से सिवा तुर्की के कोई भी भाषा इस देश मैं हैं ही नहीं, और कोई भी चौबीस घंटे के बाद विदेशी भाषा का प्रयोग सरकारी कामकाज में करेगा तोह उसकी उन उँगलियों को कुतर दो, जिससे वह कागज़ पर आइन्दा कलम नहीं चला सके।" भारत में ठीक इसकी ज़रुरत है। बिना इसके न तो हमारी राष्ट्रीयता उभरेगी और ही राष्ट्रीय एकता संभव हैं।
जब बिहार में चुनाव हो रहा था तो राजनेताओं से अपील कि गयी थी कि वह बिहार के विकास में भाषा के विकास पर भी ध्यान दें। राजनेता जीत कर खुशियों के गीत गा रहे हैं और इस जीत को जनता कि जीत बता रहे हैं, बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हैं। विकास का अगला चरण शिक्षा, स्वास्थ्य, और सफाई से है। भारत के एक नागरिक होने के नाते और ४० वर्षो के मेरे अनुभव ने बार-बार मुझे झकझोरा है । मैंने बार-बार सोचा है कि हम अपने भाषा के प्रति इतने उदासीन क्योँ हैं? भारतेंदु के ''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,-बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल" वाली उक्ति कहाँ खो गयी है?
जिस राष्ट्र कि अपनी भाषा नहीं वह राष्ट्र गूंगा ही तो है। हिंदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है, कि इसके पास महात्मा गाँधी या बाबु पुरुषोत्तम दास टंडन के समान कोई नेता नहीं जो हिंदी कि गाड़ी को आगे बढ़ा सके साहस के साथ कह सके कि अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना हिंदी से प्रेम करना देश-प्रेम करना है। हिंदी अपेक्षाकृत बड़े भोगोलिक क्षेत्र की भाषा है। पुरे समाज की अस्मिता उससे व्यक्त होती है। ज्ञान और विचार कि कुर्सी से हिंदी को धक्का न दें। डॉक्टर फादर कामिल बुल्के, विदेशी होकर भी स्वदेशी , भारतीय। भारत की आत्मा में समाए हिंदीसेवी। मन में एक टीस है, दर्द है, अपने ही घर में हिंदी बंदिनी कि तरह कैद है , और दूसरी भाषा चिढ़ा -चिढ़ा कर कह रही है , समाप्ति की ओर है। हिंदी के अख़बार भी उदासीन हैं। सच माने, फ़िल्मी दुनिया, दूरदर्शन न रहे तो हिंदी कि स्थिति मूक, टुकुर-टुकुर ताकनेवाली उस लड़की के सामान होगी, जो थैला टांगे कचरे में से सामान चुन रही हैं। मेरी आँखें, मन-मस्तिष्क उस बाज़ार के लोगों पर टिकी हैं, जो अपनी आत्मा को बेच, व्यवसायीकरण एवं अपनी अहमियत को जीवित रखने के लिए पर भाषाओँ का दंभ भरते हैं। वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजी के संसार में हिंदी का आकाश होगा, पर कब होगा वो दिन?
Wednesday, 21 March 2012
From Shillong to Patna, Alice’s journey…
There were fourteen of us, including my little grandson Shree, and we all had set out to Shillong, the capital of Meghalaya, to fetch my younger son Rahul’s bride. The schedule was tight with little or no possibility for leisure activities; still I had a few hours at hand on 1 March evening. The traveler that I am, hence, my love for exploring new places took me out, impromptu (I did manage to pull out my sister Kallo and brother-in-law Shailendra along). I had no particular destination on my mind and was neither privy to the surroundings. To top it, I had tiptoed outside the hotel ensuring no one knows about this small little adventure. However, when greenery and bounty of nature calls me, seldom do I spare much thought over trivial things.
I, therefore, stopped a local taxi and asked the driver to take us to the nearest place where we could enjoy some greenery and abundance. And here I was, at a famous lake in Shillong, called the Word’s lake. The initial plan was to just see it and not venture beyond. However, when I saw a woman keeping the gate to the lake, I could not control my excitement and went closer to talk to her. “Aaj main ek baat jan gayi ke woman kabhi bhi aur kahi bhi akeli nahi ho sakti,” I told her this with immense pleasure and she immediately stretched out her arms to hug me. I give it to her persuasion that the three of us decided to enter the lake vicinity. Nevertheless, sipping a cup of lemon tea, I thought let’s go for it.
Indeed a panoramic view, the lake set approximately at a radius of 5 km was bustling with activity. No points for guessing, it was one of the most sought after tourist spots of the city. I could see families enjoying the boating facility and couples sharing ice creams and bhutta, but beyond all these, what captured my imagination was a particular plant that had a beautiful flower blooming delightfully. “Aah!! What an arrangement of petals, this can’t be original,” I thought. I went closer to the plant and touched the leaves and flower petals to believe what I had seen. To my surprise, it turned out to be 100 percent original flower. I was amazed and the gardening enthusiast in me started screaming from inside to learn more about the plant and have one for myself.
After a small round of ask-about here and there, I managed to find the curator who told me that the variety is called Alice. “ So Alice it is for my garden,” I immediately made-up my mind that I wanted it at any cost. “But then what about Rahul?” My younger son particularly gets agitated at my habit of plant-surfing from across the globe (he thinks it only adds to my already long task-list each day and in my absence the onus falls on him to adopt the role of a virtual caretaker), “what a dilemma,” I wondered what to do. On one hand was my desperate zeal that wanted the plant in the garden (I had already imagined a place for it), and on the other was Rahul’s uptight gaze. The choice was difficult, but I love difficult things. Having struck a friendly chord with the curator, I found out all whereabouts of Alice and grabbed a piece for my garden, along with 20 other varieties that appealed to me, from the nearest nursery.
The next challenge was to keep my treasured package in hiding for one more day. At this stage, the hotel manager came to my rescue (we were put-up at a 3 star for the occasion) and offered to keep it under his observation till the time we check-out. To my good fortune, Rahul never found out about Alice ( now of course he knows). However, this is only one-half of the challenge. There’s more to how Alice finally reached Patna.
On 3rd morning while we were gearing up to leave, the manager quickly frisked the package in our luggage. All was at peace until this stage, but I was worried what would happen at the airport check-in. Thanks to Alhuwalia Bhaisab who told me, “didi agar aap ko plant chahiye, toh yeh jayega at any cost,” the reassurance really mattered at that stage. Alhuwalia Bhaisab is a very close family friend and he very well knew my love for plants. He managed to conveniently sneak the package through the luggage checking. Then came the time to check-in and I don’t have words to explain what I felt when the airport security executive asked me to open the package (they usually do so for cabin baggage) with Rahul standing next to me. I was praying I vanish, nevertheless looks like some divine intervention and as Rahul saw the plant coming out of the tightly wrapped bag, he just gave me a weary look that said “ I told you…,” and I returned a smile back that conveyed, “… but you know how much I love plants…,” and all was set.
Alice traveled on-board with us from, Shillong to Guwahati, Guwahati to Kolkata, and finally from Kolkata to Patna, with a smiling Rahul by my side. I must add it was a great reconciliation to be traveling with two of my most precious things in life – my children and my plants. And even more fulfilling it is to see, Alice standing petite in the garden, ready to bloom into our lives.
Dr. Shashi Rao
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