विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में भारतीय सभ्यता और संस्कृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है । भारतीय संस्कृति में माता पिता को सर्वोपरि माना गया है । हमारे भारतीय धर्मशास्त्रों में माता को प्रथम स्थान, पिता को द्वितीय, तत्पश्चात गुरु का स्थान है । गुरु को गोविन्द से भी बड़ा कहा गया है, परन्तु अब समाज के बदलते आधुनिक परिवेश एवं आधुनिकता के रंग में रंगी हुई लोक प्रवृति माता - पिता के महत्तव को नही समझती है । आज अधिकतम परिवारों में उनकी अपेक्षा की जाती है । अधिकांश परिवारों में वृद्ध माता पिता दीन - हीन अवस्था में रह रहे हैं । आज परिवार व समाज में उनका कोई सम्मान नहीं है।
पुत्रों द्वारा उनको तरह तरह से यातना दी जाती है, अपमानित किया जाता है। बच्चे यह नहीं सोचते की कल उनकी भी ऐसी ही दशा होगी । माता पिता अपना सर्वस्व उनपर लुटा देते हैं। जीवन भर की अपनी कमाई, अपना समय, अपनी सोच , चिंतन , आराम को उनपर न्योछावर कर देते हैं। वे अपना तन-मन-धन अपने पुत्र पुत्रियों की पढ़ाई -लिखाई शादी विवाह पर खर्च कर देते हैं। उनके द्वारा अर्जित उनकी जीवन भर की कमाई एवं संपत्ति उनके पुत्रों द्वारा अधिकार कर उनको इतना कमज़ोर एवं नि:सहाय बना दिया जाता है कि वे अपना जीवन यापन भरण -पोषण भी नहीं कर पाते । असमर्थ हो दर-दर की भीख मांगने पर विवश हो जाते हैं और और यह उस समय होता है जब वे पूर्णरूप से शारिरिक , मानसिक तथा आर्थिक रूप से अस्वस्थ एवं कमज़ोर हो जाते है। प्रश्न विचारणीय है की क्योँ ऐसा? व्यक्तिपरक समाज को कहाँ ले जा रहा है? हम कहते हैं कि हम विकसित विश्व और समाज के विकासशील मनुष्य है ? फिर अपनी ही जड़ को अपने ही हाथों से क्यों काटते है? संविधान और अदालत - माँ और बाप ? कैसी विडम्बना है, जो अपने ही जनक और जानकी को कटघरे पर खड़ा होने पर मजबूर करती है।
माता पिता की अपेक्षा करने पर क़ानूनी तौर पर अदालत मैं खड़ा किया जा सकता है। भारत सरकार द्वारा मेन्टेनेन्स एंड वेल्फेर ऑफ़ परेंट्स एंड सिनियर सिटीज़न एक्ट 2007/56 दिसंबर 2007 की लोक सभा मैं पारित किया गया है। सरकार ने कदम उठाया, जो प्रशंसनीय है। पिता की अपेक्षा करने वाले उत्तराधिकारी पुत्र पुत्रियों के लिए जो संविधान पारित हुआ वह माता-पिता का रक्षक ही नहीं है, भारतीय संस्कृति, परम्परा एवं "मातृ- पितृ देवो भवो" का संवाहक है। ह्रदय मे बात चुभती है - फिरभी क्या करें "बिन भय होत न प्रीति" वाली कहावत चरितार्थ होती है। माता-पिता की उचित देख भाल भरण पोषण नहीं करने वाले पुत्र पुत्रियों को प्राधिकरण में ले जाया जा सकता है, शिकायत दर्ज की जा सकती है। यदि माता-पिता प्राधिकरण में जाने तक असमर्थ हैं तो किसी दुसरे माध्यम से शिकायत को जिलाधिकारी अथवा जनपद न्यायालय मैं पंहुचा सकते हैं। सूचना एवं जानकारी के लिए यह ध्यातव्य रहे कि यह प्राधिकरण प्रत्येक जिले में स्थापित किया गया है, देख-रेख स्वयं जिलाधिकारी एवं जनपद न्यायाधीश करते हैं।यह प्राधिकरण सामान्य रूप मे परिवार अदालत के नाम से जानी जाती है। इसके सदस्य भी प्राय: वरिष्ट नागरिक ही होते है। इस कानून के अतिरिक्त प्राधिकरण उत्तराधिकारियों को एक नोटिस भेजकर प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित होने का आदेश देता है। यदि परिवादी नोटिस मिलने के बाद भी इसकी अवहेलना करता है तो प्राधिकरण उन्हें दंडित व जुर्माना देकर जेल भी भेज सकता है। जुरमाना तथा जेल की अवधि की सीमा प्राधिकरण के विवेक पर है। यदि उत्तराधिकारी विदेश में रहता है तो यह कानून उसके लिए वहाँ भी लागू होगा और उनकी संपत्ति ज़ब्त की जा सकती है।
कानून के अंतर्गत माता-पिता या वृद्ध -वृद्धा की याचिका के अनुसार उनके उत्तराधिकारी उनको मेन्टेनेन्स देने को बाध्य होंगे। इसका निर्धारण याचिका की पृष्ठभूमि के अनुसार किया जायेगा । इस सम्बन्ध में प्रत्येक राज्य सरकार मैं दिशा निर्देश भी स्पष्ट कर चुके हैं। यदि किसी वृद्ध के एक से अधिक उत्तराधिकारी है, तो यापन का जीवन यापन का खर्च सभी उत्तराधिकारीयों को सामान रूप से देना होगा। कानून अपनी जगह है । हम आत्मनिरीक्षण, आत्मविवेचन, आत्ममूल्यांकन करें, क्या कानून की ज़रुरत पड़नी चाहिए? सुबह का भूला शाम को घर आ जाता है, तो हम उसे भूला नहीं कहते। हम अपने वृद्ध माता-पिता के महत्व को समझें । उनकी अधिक से अधिक सेवा करके उनको प्रसन्न करें , उनके आशिर्वाद भरे हाथ हमारे मस्तक पर हों, उनका अचल ज्ञान और अनुभव हमारा पथ- प्रदर्शन करे।
"सुत मित नारी भवन परिवारा,
होहिं जाहिं जग बारहिं बारा,
मिलहिं न जग में जीवन दाता,
मात पितु जन सहोदर भ्राता ।"
हमारे माता-पिता ठीक उस बरगद के वृक्ष के समान हैं जहाँ सैंकड़ो पक्षी रूपी रिश्तेदार , उनके प्रेम रूपी छाया में आकर अपना आश्रय पाते हैं । संयुक्त परिवार में न केवल संस्कार पाए जाते हैं, अपनत्व , सूझ -बूझ व सामाजिक आचरण की शिक्षा भी मिलती है। अभी हाल में भारितीय समाज ने संयुक्त परिवार के महत्व को समझा है । भारतीय संस्कृति “वसुधेव कुटुम्बकम” के सुन्दर आदर्शों पर आधारित है।