कौन कहता है कि -
तुम्हारी इज्ज़त पर लगी है दाग?
तुम्हारी इज्ज़त ने खोली है करोड़ों की आँख ।
तुम्हारे मनोबल ने जगाया है सोने वालों को,
भारत की हर बेटियों की हो तुम शान सरताज |
औरत की इज्ज़त को जब लोग रखते हैं ताखे पर,
बेचते हैं उसे बाज़ारों में,
तो क्या बच जाता है ?
आदमियत का हो जाता है खात्मा,
मनुष्यता करती है चीत्कार |
इज्ज़त के लुटेरों को कर दो बेनकाब,
बड़े-बड़े तख्तियों के जो हैं मालिक,
क्या कानों में नहीं रेंगती जूँ ?
शर्मिन्दिगी से झुका है हर चेहरा,
दिल्ली, त्रिपुरा, झारखण्ड, मथुरा, बलात्कार कांड,
रूपम , आयेशा, की इज्ज़त को मिलाया है मिटटी में,
उनके ही समाज के कर्णधार ।
रहते हैं बड़ी-बड़ी कोठियों, बंगलों में,
उन्हें ऐशो-आराम से फुर्सत कहाँ ?
उन्हें क्या पता, क्या होता है समाज में ?
दिन दहाड़े, रातों में, लुटती है अस्मत,
घर की बेटी लक्ष्मियों का ।
ये तो मस्ती में डूबें हैं यार।
पर रखना याद-
हो रहा है अनाचार, अत्याचार, बलात्कार,
दसों दिशायें, नक्षत्र, ग्रह, कर रहे हैं चीत्कार।
धरती माता फिर फट जायेगी, होगा भूकंप विकराल।
जगत जननी सीता पर किया है तुमने प्रहार।
फांसी के बदले-
बदलो पुरुषों की सोच, मनोवृत्ति, भावना को,
हर विद्यालयों में लो इसका क्लास |
और बनाओं समाज की हर लड़की को ,
निर्भया, निर्भया, निर्भया |
ताकि बनी रहे हमारें पूर्वजों की परम्परा, संस्कृति, सभ्यता, विशाल ।
जिन्होंने बनाया था -
"यत्र पूज्यन्ते नार्यान, तत्र देवता रम्यन्ते,"
पुनः परम निर्भया को करती हूँ अर्चना, वंदना एवं क्षमा याचना
तुम हो भारत की हर बेटियों की सरताज ।
Published in Dainik Prabhat on 26th Dec, 2012.
तुम्हारी इज्ज़त पर लगी है दाग?
तुम्हारी इज्ज़त ने खोली है करोड़ों की आँख ।
तुम्हारे मनोबल ने जगाया है सोने वालों को,
भारत की हर बेटियों की हो तुम शान सरताज |
औरत की इज्ज़त को जब लोग रखते हैं ताखे पर,
बेचते हैं उसे बाज़ारों में,
तो क्या बच जाता है ?
आदमियत का हो जाता है खात्मा,
मनुष्यता करती है चीत्कार |
इज्ज़त के लुटेरों को कर दो बेनकाब,
बड़े-बड़े तख्तियों के जो हैं मालिक,
क्या कानों में नहीं रेंगती जूँ ?
शर्मिन्दिगी से झुका है हर चेहरा,
दिल्ली, त्रिपुरा, झारखण्ड, मथुरा, बलात्कार कांड,
रूपम , आयेशा, की इज्ज़त को मिलाया है मिटटी में,
उनके ही समाज के कर्णधार ।
रहते हैं बड़ी-बड़ी कोठियों, बंगलों में,
उन्हें ऐशो-आराम से फुर्सत कहाँ ?
उन्हें क्या पता, क्या होता है समाज में ?
दिन दहाड़े, रातों में, लुटती है अस्मत,
घर की बेटी लक्ष्मियों का ।
ये तो मस्ती में डूबें हैं यार।
पर रखना याद-
हो रहा है अनाचार, अत्याचार, बलात्कार,
दसों दिशायें, नक्षत्र, ग्रह, कर रहे हैं चीत्कार।
धरती माता फिर फट जायेगी, होगा भूकंप विकराल।
जगत जननी सीता पर किया है तुमने प्रहार।
फांसी के बदले-
बदलो पुरुषों की सोच, मनोवृत्ति, भावना को,
हर विद्यालयों में लो इसका क्लास |
और बनाओं समाज की हर लड़की को ,
निर्भया, निर्भया, निर्भया |
ताकि बनी रहे हमारें पूर्वजों की परम्परा, संस्कृति, सभ्यता, विशाल ।
जिन्होंने बनाया था -
"यत्र पूज्यन्ते नार्यान, तत्र देवता रम्यन्ते,"
पुनः परम निर्भया को करती हूँ अर्चना, वंदना एवं क्षमा याचना
तुम हो भारत की हर बेटियों की सरताज ।
Published in Dainik Prabhat on 26th Dec, 2012.