बिहार, हाँ बिहार को लेकर सपना है मेरे मन में,
यह भी है मालूम-सपने सदा पुरे नहीं होते।
यह सिर्फ बिहार कि बात नहीं -
पुरे हिंद और हिंदुस्तान कि बात है।
है मन के अन्दर टीस जो हर क्षण बेधता है,
हम चहुंमुखी विकास कि बात करते हैं
हमने सड़कों को तो बना दिया -
शिक्षा को आगे बढ़ा लिया -
बहुत अविकसित क्षेत्र, हमारी योजनाओं में हैं- पर क्या?
हमने अपनी , मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में
क्या कभी सपनों में भी सोचा?
विकसित राज्यों कि श्रेणियों में हमारी गिनती हो रही है ,
पर हमारी अस्मिता अन्दर ही अन्दर रो रही हैं।
सच कहूँ! दिए तले अँधेरा हैं।
तामस कि इस रात ने रोशनी कि बहुत ज़रुरत है ।
विक्रमशिला, नालंदा, वैशाली- सहमे-सहमे खड़े हैं।
गाँधी का सपना अधूरा है - हम अंग्रेजियत का लबादा लादे,
अपने को विकसित और आधुनिक बताते हैं।
सच कहूँ- भेजते हैं बेटे-बेटियों को कॉन्वेंट में,
कारण उनके करियर से कर नहीं सकते खिलवाड़।
ऊँची कुर्सी कि ललक और पहुँच,
हमें पहुचाती है अंग्रेजी के दरबार में।
हमें अंग्रेजी से कोई लड़ाई नहीं!
भाषा तो भाषा है ।
रामू, महेश, सुखिया, मुनिया, रमेश्री की आँखों में
एक सवाल हैं - हम कहाँ खड़े होंगे जहाँ हमारी भाषा ही नहीं।
कब होगा वो दिन जब रूस, जापान की तरह एवं अन्य स्वभाषा भाषी देशों की तरह,
बंगाल, तमिल नाडू राज्यों की तरह,
हमारा हिंदुस्तान भी अपनी भाषा में बोलेगा?
पहुँचाना है हम सभी को जन-जन तक ये सन्देश- करो अपनी भाषा का मान,
और हिंद और हिंदुस्तान बनाएं अपनी एक पहचान।
No comments:
Post a Comment