Tuesday, 12 June 2012

आएगा ज़रूर एक नया निजाम


भेजा है आपने एक पैगाम
दुनिया को ज़रुरत है एक नए निजाम का सलाम ।
जो सिखाये सबक - आत्मक्रांति की,
जो पढाये  पाठ  श्रम, मानवसेवा की ,
और सुशक्ति के बल पर चलाये समाज को ।
जो गिनाये गिनती -
असफलताओं से भरे समाजसेवी रूपी गणितग्यों की ।
जो घुमाये अपने को विकसित कहने  वाले देशों की ,
नर कंकालों से भरी  हैं खोखली संस्कृति जिनकी,
कहलाने को हैं साम्राज्यवाद , पूंजीवाद, लोकतंत्र के पोषक -
जो खिलने नहीं देते, फूलने नहीं देते , रुपये के मूल्य को ।
मुद्रास्थिति का गुज़रता दौर ,
फैला हैं विश्वरूपी बाज़ार में  ।
बजा रहा है खतरे की घंटी ,
भारत की अर्थव्यवस्था रही है लड़खड़ा ।
लेखक ने किया है  इसे उजागर ,
उनकी जागरूकता के हैं हम शुक्रगुजार ।
पर हूँ, पूर्ण विश्वस्त आएगा सतयुग,
 जो देगा हमें एक नया निजाम ।

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