Saturday, 16 June 2012

कौन सी आग है बड़ी?


बरस रही थी आग,
सड़कों से लोग गए थे भाग ।
छाई थी शमसान सी निस्तब्धता,
भीषण लू और गर्मी का था,
चारो ओर साम्राज्य।
घरों के अन्दर ए. सी में बैठ कर ठंडी हवाओं के बीच थी गहमागहमी -
होगा अगला राष्ट्रपति कौन ?
छन रहे थे पुए और पकवान,
बन रहा था पुलाव।
वहीँ दूसरी ओर -
इसी तपिश में,
पेड़ों के नीचे दुबके थे -
रिक्शाचालक, मजदूर और किसान,
अपनी पेट की आग बुझाने को।
नंगी तस्वीर थी भूखी माँ की,
थे चिथड़ों में लिपटे बच्चे -
जो कई शाम से थे निराहार ।
महंगाई की मार ने दी कमर तोड़ ।  
हमे और आपको लगी थी चिंता,
सुखाने की पसीनों की ,
और उन्हें थी चिंता पसीना बहाने की ।
उन बेचारों को था इंतज़ार मुसाफिरों की , कामों की , पैसा कमाने की ।
ताकि बुझा सके पेट की गर्मी को, अपने-अपने परिवारों की,
पूछना  है आपसे एक सवाल -
बाहर की गर्मी है बड़ी या उससे भी बड़ी है पेट की आग?

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