Saturday, 28 April 2012

माँ-बाप क़दमों की धूल नहीं, माथे की शान


रातों की रात जिसने बिताया तेरे साथ,
कर दिया तुमने उन्हें अपने से अलग, हाथों हाथ।
तेरी एक-एक मुस्कानों के लिए,
कर दिया जिन्होंने जीवन अपना न्योछावर।
करते रहते हो अपने ही मुस्कानों की बात।
पूछते नहीं मरते या जीते हैं वो -
सर्वस्व लुटाकर भी सिल लिया है -
जिन्होंने अपने होठों को हर बार ।
लौटकर जाते नहीं दरवाज़ों पे उनके -
मरे या जीते हैं, या उनकी लाश ।
मरने के बाद देते हो श्रद्धांजलि -
यह हैं हास्यास्पद बात ।
श्रद्धांजलि देकर, है क्या फायदा?
अरे ! जीते जी पूछे नहीं - दुःख-सुख, दवाइयाँ और कपड़े ।
अनांजलि भी देकर, कीजिये ज्यादा सेवा ।
ईश्वर लेगा हिसाब,पूछेगा -
तुमने किया नहीं सेवा का वायदा पूरा।
शर्म, हया है दिया बेच।
कचोटती नहीं आत्मा -
देते हुए श्रद्धांजलि -
जब तक जीवित थे माता-पिता,
तब तक तो दिया तिलांजलि ।
फोटो को पहनाते हो हार ,
गर्म करते हो दिखावे का बाज़ार।
देते हो पुष्पांजलि -
माता-पिता मरे नहीं - यह कहो ही नहीं,
यह मत करो, और न लगाओ बाह्यड म्बर की झड़ी।
माँ-बाप मरने के बाद जला दिए गए,
गंगा, जमुना, नर्मदा के घाटों पर,
बहा दी गयीं अस्थियाँ हरिद्वार और वाराणसी में,
किया जमकर श्राद्ध,
लुटाया करोड़ों की संपत्ति,
सेवा न कर, दिया दिखावे भरी फूलों की श्रद्धांजलि ।
हुए झंझट से मुक्त,
पर सोचना आएगी तेरी भी ये घड़ी।
तुम्हारे पूर्वजों के संस्कार,
दे रहे हैं चेतावनी -
कर रहीं हैं उनकी आत्माएं गुहार,
जागो !  जागो !
मानव जाति पहली बार
गुजर रहा है संक्रांति के समर से,
माता-पिता की आत्मा को दुखानें से होता नहीं,
घर में सुख शांति का सबेरा,
करो दूर अपने मन का अँधेरा,
भौतिकवादी युग की चमक में,
अपने को न बेचो ,
टूट जाएगा वेद पुराणों का विश्वास,
आत्मा उनकी मरती नहीं,
जलता है केवल शरीर।
कर उनकी अटूट सेवा,
भरो अपने मन में श्रद्धा, प्रेम और विश्वास,
और ले लो उनका कोटिश: आशीर्वाद।



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