हिंदी का प्रश्न राष्ट्रीयता और अस्मिता का प्रश्न हैं। इसमे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। अक्सर मैं कहती हूँ हिंदी की गाड़ी रह रह कर आगे से पीछे की और सरकने लगती हैं, या फिर चलते चलते दल दल में धँसने लगती हैं। ऐसा क्योँ होता हैं? इसलिए कि हमारे अन्दर न तो स्पष्टता है, और न ही संकल्प। फल यह हैं कि हम भँवर में फँस चुके हैं । भारतीय संविधान कि धारा ३४६ में स्पष्ट रूप से कहा गया है --
"संघ की राष्ट्र भाषा हिंदी और देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले हिंदी अंको का रूप भारतीय अंको का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा" जो - हमें रह रह कर मुंह चिढ़ाता रहता हैं।
आज वस्तुस्थिति यह हैं कि जहाँ हिंदी हैं वहाँ क्षेत्रीयता के जीवाणु कणों ने अपनी जड़ जमा ली हैं । इन बातो में विशेष नहीं जा कर, यहाँ में हिंदी के उस रूप को प्रदर्शित करना चाहूंगी, जिसे मैंने कई युगों पूर्व विश्व हिंदी सम्मेलनों के द्वारा जाना था। पिछले दिनों के सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता हैं, हमारे देश में अंग्रजी बोलने वालों की संख्या १२.५३ करोड़ है । हिन्दीभाषी (५.१३ करोड़) दुसरे नंबर पर हैं। यह भी ज्ञात है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ग्रेट ब्रिटेन कि जनसंख्या से दुगनी है । जब हमारे यहाँ ग्रेट ब्रिटेन के लोगों से दुगने अंग्रेजी बोलने वाले हैं , तब अंग्रेजी के कारोबार को भी तेज़ी से बढ़ना चाहिए, जैसे कि अंग्रेजी अख़बार, सिनेमा, टीवी चैनल, किताबें आदि, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सर्वेक्षण भारतीय जनगणना २०११ के आकड़ों पर आधारित है । इससे यह ज्ञात होता हैं कि देश में कितने लोग एक से लेकर तीन भाषाएँ बोलते हैं । यह अंग्रेजी को ध्यान में रख कर किया गया हैं इसलिए यहाँ अंग्रेजी कि विशेषता दिखलाई पड़ती है। हम यह देख रहे हैं कि देश में हिंदी बोलने वालों कि संख्या से चार गुनी, इंग्लैंड के लोगों से आठगुनी, और अमेरिका कि आबादी से दुगनी है । जनगणना आकड़ों के अनुसार २०११ में हिंदी को अपनी भाषा बताने वालो कि संख्या ४२.२ करोड़ थी, यानि १३ करोड़ लोग इसमें गैर हिंदी भाषी और जुड़े जो हिंदी बोल पाते थे। हिंदी का सरप्लस अंग्रेजी के टोटल के बराबर है। अभी हमने ५.२ करोड़ उर्दू भाषियों को रखा ही नहीं। वस्तुत वह हिंदी ही बोलते हैं । अंग्रेजी की शक्ति और महत्ता अस्वीकार नहीं हैं, उसकी जहाँ ज़रुरत हैं उसका उपयोग हो पर हम यह सोचे कि हिंदी या हमारे देश कि जीवित अन्य भाषाएँ मर जाए और अंग्रेजी विश्व भाषा बनकर उभरें तो यह गलत सोच होगी। विश्व हिंदी सम्मेलनों में भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने मत दिए, हिंदी की सिफारिश की, लेकिन आज बात फिर वही ढाक के तीन पात वाली चरितार्थ हुई।
स्मृतियों का पन्ना खुलना चाहता हैं - स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की वो छात्रा, शशि - जिसे बाबा बुल्के का सानिध्य प्राप्त था। अपने आपको धन्यतिधन्य समझती थी और भिन्न भिन्न सरकारी सेवाओं को छोड़ अपने आप को हिंदी हतु समर्पित कर दिया था , पर आज? आज हमें आज़ादी मिल गयी है , लोकतंत्र बहल हो गया है , लेकिन कैसी आज़ादी और कैसा लोकतंत्र? जब हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए है इसकी अस्पष्ट जवाबदेही सरकार और राजनेताओं पर है जिसके कारण यह राष्ट्रभाषा का प्रश्न अनुत्तरित है
२५ अगस्त १९४६ को महात्मा गाँधी ने कहा "मेरी मातृभाषा में खामियाँ क्योँ न हो मैं इससे उसी तरह चिपटा रहूँगा जैसे बच्चा अपनी माँ से रहता है। माँ उसे जीवनदायिनी दूध दे सकती है । अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी हकदार वह नहीं है तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा। वह कुछ लोगों के सिखने की चीज़ हो सकती है, लाखों करोड़ों की नहीं।" महात्मा गाँधी के प्रयत्न से ही १९३५ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने हिंदी भाषा को स्वीकार किया। कमेटी ने कहा " अगर कोई वक्ता हिन्दुस्तानी न जानता हो या आवश्यकता पड़ने पर तो अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल कर सकता है । कमेटी की कारवाही की भाषा हिंदी ही होगी।"
महात्मा गाँधी के अनुसार राष्ट्रभाषा का पद ग्रहण करने के लिए निम्नांकित गुणों का होना आवश्यक हैं -
१. यह भाषा सरकारी नौकरी के लिए आसन हो ।
२. उस भाषा मैं भारत के धार्मिक, आर्थिक, और राजनितिक कामकाज हो सकना संभव हो सके\
३. उस भाषा को देश के ज़्यादातर लोग बोलते हो।
४. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो।
५. उस भाषा का विचार करते हुए क्षणिक या कुछ समय तक रहनेवाली, स्थिति पर जोर नहीं दिया जाए। उपयुर्क्त गुण हिंदी में हैं।
१४ सितम्बर १९४९ को हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल गया। तब से अब तक का पुनरावलोकन किया जाये तो ज्ञात होता है, कि हम दूसरी भाषा के व्यामोह में इस तरह फँस चुके हैं, कि हमारी अपनी मौलिकता रही ही नहीं। अंग्रेजी स्कूलों और भाषा के नीचे हमारी आत्मा गिरवी हो गयी है। हम अमावस्या के अन्धेरे में टार्च कि रौशनी में अपनी, सभ्यता और संस्कृति को ढूँढ रहे हैं।
"आज आवश्यकता है किसी ऐसे नेता की, जो तुर्की के मुस्तफा कमालपाशा की तरह कह दे कि, समझ लो कल से सिवा तुर्की के कोई भी भाषा इस देश मैं हैं ही नहीं, और कोई भी चौबीस घंटे के बाद विदेशी भाषा का प्रयोग सरकारी कामकाज में करेगा तोह उसकी उन उँगलियों को कुतर दो, जिससे वह कागज़ पर आइन्दा कलम नहीं चला सके।" भारत में ठीक इसकी ज़रुरत है। बिना इसके न तो हमारी राष्ट्रीयता उभरेगी और ही राष्ट्रीय एकता संभव हैं।
जब बिहार में चुनाव हो रहा था तो राजनेताओं से अपील कि गयी थी कि वह बिहार के विकास में भाषा के विकास पर भी ध्यान दें। राजनेता जीत कर खुशियों के गीत गा रहे हैं और इस जीत को जनता कि जीत बता रहे हैं, बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हैं। विकास का अगला चरण शिक्षा, स्वास्थ्य, और सफाई से है। भारत के एक नागरिक होने के नाते और ४० वर्षो के मेरे अनुभव ने बार-बार मुझे झकझोरा है । मैंने बार-बार सोचा है कि हम अपने भाषा के प्रति इतने उदासीन क्योँ हैं? भारतेंदु के ''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,-बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल" वाली उक्ति कहाँ खो गयी है?
जिस राष्ट्र कि अपनी भाषा नहीं वह राष्ट्र गूंगा ही तो है। हिंदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है, कि इसके पास महात्मा गाँधी या बाबु पुरुषोत्तम दास टंडन के समान कोई नेता नहीं जो हिंदी कि गाड़ी को आगे बढ़ा सके साहस के साथ कह सके कि अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना हिंदी से प्रेम करना देश-प्रेम करना है। हिंदी अपेक्षाकृत बड़े भोगोलिक क्षेत्र की भाषा है। पुरे समाज की अस्मिता उससे व्यक्त होती है। ज्ञान और विचार कि कुर्सी से हिंदी को धक्का न दें। डॉक्टर फादर कामिल बुल्के, विदेशी होकर भी स्वदेशी , भारतीय। भारत की आत्मा में समाए हिंदीसेवी। मन में एक टीस है, दर्द है, अपने ही घर में हिंदी बंदिनी कि तरह कैद है , और दूसरी भाषा चिढ़ा -चिढ़ा कर कह रही है , समाप्ति की ओर है। हिंदी के अख़बार भी उदासीन हैं। सच माने, फ़िल्मी दुनिया, दूरदर्शन न रहे तो हिंदी कि स्थिति मूक, टुकुर-टुकुर ताकनेवाली उस लड़की के सामान होगी, जो थैला टांगे कचरे में से सामान चुन रही हैं। मेरी आँखें, मन-मस्तिष्क उस बाज़ार के लोगों पर टिकी हैं, जो अपनी आत्मा को बेच, व्यवसायीकरण एवं अपनी अहमियत को जीवित रखने के लिए पर भाषाओँ का दंभ भरते हैं। वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजी के संसार में हिंदी का आकाश होगा, पर कब होगा वो दिन?
"संघ की राष्ट्र भाषा हिंदी और देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले हिंदी अंको का रूप भारतीय अंको का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा" जो - हमें रह रह कर मुंह चिढ़ाता रहता हैं।
आज वस्तुस्थिति यह हैं कि जहाँ हिंदी हैं वहाँ क्षेत्रीयता के जीवाणु कणों ने अपनी जड़ जमा ली हैं । इन बातो में विशेष नहीं जा कर, यहाँ में हिंदी के उस रूप को प्रदर्शित करना चाहूंगी, जिसे मैंने कई युगों पूर्व विश्व हिंदी सम्मेलनों के द्वारा जाना था। पिछले दिनों के सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता हैं, हमारे देश में अंग्रजी बोलने वालों की संख्या १२.५३ करोड़ है । हिन्दीभाषी (५.१३ करोड़) दुसरे नंबर पर हैं। यह भी ज्ञात है कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या ग्रेट ब्रिटेन कि जनसंख्या से दुगनी है । जब हमारे यहाँ ग्रेट ब्रिटेन के लोगों से दुगने अंग्रेजी बोलने वाले हैं , तब अंग्रेजी के कारोबार को भी तेज़ी से बढ़ना चाहिए, जैसे कि अंग्रेजी अख़बार, सिनेमा, टीवी चैनल, किताबें आदि, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सर्वेक्षण भारतीय जनगणना २०११ के आकड़ों पर आधारित है । इससे यह ज्ञात होता हैं कि देश में कितने लोग एक से लेकर तीन भाषाएँ बोलते हैं । यह अंग्रेजी को ध्यान में रख कर किया गया हैं इसलिए यहाँ अंग्रेजी कि विशेषता दिखलाई पड़ती है। हम यह देख रहे हैं कि देश में हिंदी बोलने वालों कि संख्या से चार गुनी, इंग्लैंड के लोगों से आठगुनी, और अमेरिका कि आबादी से दुगनी है । जनगणना आकड़ों के अनुसार २०११ में हिंदी को अपनी भाषा बताने वालो कि संख्या ४२.२ करोड़ थी, यानि १३ करोड़ लोग इसमें गैर हिंदी भाषी और जुड़े जो हिंदी बोल पाते थे। हिंदी का सरप्लस अंग्रेजी के टोटल के बराबर है। अभी हमने ५.२ करोड़ उर्दू भाषियों को रखा ही नहीं। वस्तुत वह हिंदी ही बोलते हैं । अंग्रेजी की शक्ति और महत्ता अस्वीकार नहीं हैं, उसकी जहाँ ज़रुरत हैं उसका उपयोग हो पर हम यह सोचे कि हिंदी या हमारे देश कि जीवित अन्य भाषाएँ मर जाए और अंग्रेजी विश्व भाषा बनकर उभरें तो यह गलत सोच होगी। विश्व हिंदी सम्मेलनों में भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने मत दिए, हिंदी की सिफारिश की, लेकिन आज बात फिर वही ढाक के तीन पात वाली चरितार्थ हुई।
स्मृतियों का पन्ना खुलना चाहता हैं - स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की वो छात्रा, शशि - जिसे बाबा बुल्के का सानिध्य प्राप्त था। अपने आपको धन्यतिधन्य समझती थी और भिन्न भिन्न सरकारी सेवाओं को छोड़ अपने आप को हिंदी हतु समर्पित कर दिया था , पर आज? आज हमें आज़ादी मिल गयी है , लोकतंत्र बहल हो गया है , लेकिन कैसी आज़ादी और कैसा लोकतंत्र? जब हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए है इसकी अस्पष्ट जवाबदेही सरकार और राजनेताओं पर है जिसके कारण यह राष्ट्रभाषा का प्रश्न अनुत्तरित है
२५ अगस्त १९४६ को महात्मा गाँधी ने कहा "मेरी मातृभाषा में खामियाँ क्योँ न हो मैं इससे उसी तरह चिपटा रहूँगा जैसे बच्चा अपनी माँ से रहता है। माँ उसे जीवनदायिनी दूध दे सकती है । अगर अंग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी हकदार वह नहीं है तो मैं उससे सख्त नफरत करूँगा। वह कुछ लोगों के सिखने की चीज़ हो सकती है, लाखों करोड़ों की नहीं।" महात्मा गाँधी के प्रयत्न से ही १९३५ में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने हिंदी भाषा को स्वीकार किया। कमेटी ने कहा " अगर कोई वक्ता हिन्दुस्तानी न जानता हो या आवश्यकता पड़ने पर तो अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल कर सकता है । कमेटी की कारवाही की भाषा हिंदी ही होगी।"
महात्मा गाँधी के अनुसार राष्ट्रभाषा का पद ग्रहण करने के लिए निम्नांकित गुणों का होना आवश्यक हैं -
१. यह भाषा सरकारी नौकरी के लिए आसन हो ।
२. उस भाषा मैं भारत के धार्मिक, आर्थिक, और राजनितिक कामकाज हो सकना संभव हो सके\
३. उस भाषा को देश के ज़्यादातर लोग बोलते हो।
४. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो।
५. उस भाषा का विचार करते हुए क्षणिक या कुछ समय तक रहनेवाली, स्थिति पर जोर नहीं दिया जाए। उपयुर्क्त गुण हिंदी में हैं।
१४ सितम्बर १९४९ को हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल गया। तब से अब तक का पुनरावलोकन किया जाये तो ज्ञात होता है, कि हम दूसरी भाषा के व्यामोह में इस तरह फँस चुके हैं, कि हमारी अपनी मौलिकता रही ही नहीं। अंग्रेजी स्कूलों और भाषा के नीचे हमारी आत्मा गिरवी हो गयी है। हम अमावस्या के अन्धेरे में टार्च कि रौशनी में अपनी, सभ्यता और संस्कृति को ढूँढ रहे हैं।
"आज आवश्यकता है किसी ऐसे नेता की, जो तुर्की के मुस्तफा कमालपाशा की तरह कह दे कि, समझ लो कल से सिवा तुर्की के कोई भी भाषा इस देश मैं हैं ही नहीं, और कोई भी चौबीस घंटे के बाद विदेशी भाषा का प्रयोग सरकारी कामकाज में करेगा तोह उसकी उन उँगलियों को कुतर दो, जिससे वह कागज़ पर आइन्दा कलम नहीं चला सके।" भारत में ठीक इसकी ज़रुरत है। बिना इसके न तो हमारी राष्ट्रीयता उभरेगी और ही राष्ट्रीय एकता संभव हैं।
जब बिहार में चुनाव हो रहा था तो राजनेताओं से अपील कि गयी थी कि वह बिहार के विकास में भाषा के विकास पर भी ध्यान दें। राजनेता जीत कर खुशियों के गीत गा रहे हैं और इस जीत को जनता कि जीत बता रहे हैं, बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हैं। विकास का अगला चरण शिक्षा, स्वास्थ्य, और सफाई से है। भारत के एक नागरिक होने के नाते और ४० वर्षो के मेरे अनुभव ने बार-बार मुझे झकझोरा है । मैंने बार-बार सोचा है कि हम अपने भाषा के प्रति इतने उदासीन क्योँ हैं? भारतेंदु के ''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,-बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल" वाली उक्ति कहाँ खो गयी है?
जिस राष्ट्र कि अपनी भाषा नहीं वह राष्ट्र गूंगा ही तो है। हिंदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है, कि इसके पास महात्मा गाँधी या बाबु पुरुषोत्तम दास टंडन के समान कोई नेता नहीं जो हिंदी कि गाड़ी को आगे बढ़ा सके साहस के साथ कह सके कि अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना हिंदी से प्रेम करना देश-प्रेम करना है। हिंदी अपेक्षाकृत बड़े भोगोलिक क्षेत्र की भाषा है। पुरे समाज की अस्मिता उससे व्यक्त होती है। ज्ञान और विचार कि कुर्सी से हिंदी को धक्का न दें। डॉक्टर फादर कामिल बुल्के, विदेशी होकर भी स्वदेशी , भारतीय। भारत की आत्मा में समाए हिंदीसेवी। मन में एक टीस है, दर्द है, अपने ही घर में हिंदी बंदिनी कि तरह कैद है , और दूसरी भाषा चिढ़ा -चिढ़ा कर कह रही है , समाप्ति की ओर है। हिंदी के अख़बार भी उदासीन हैं। सच माने, फ़िल्मी दुनिया, दूरदर्शन न रहे तो हिंदी कि स्थिति मूक, टुकुर-टुकुर ताकनेवाली उस लड़की के सामान होगी, जो थैला टांगे कचरे में से सामान चुन रही हैं। मेरी आँखें, मन-मस्तिष्क उस बाज़ार के लोगों पर टिकी हैं, जो अपनी आत्मा को बेच, व्यवसायीकरण एवं अपनी अहमियत को जीवित रखने के लिए पर भाषाओँ का दंभ भरते हैं। वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेजी के संसार में हिंदी का आकाश होगा, पर कब होगा वो दिन?
No comments:
Post a Comment