Saturday, 16 June 2012

कौन सी आग है बड़ी?


बरस रही थी आग,
सड़कों से लोग गए थे भाग ।
छाई थी शमसान सी निस्तब्धता,
भीषण लू और गर्मी का था,
चारो ओर साम्राज्य।
घरों के अन्दर ए. सी में बैठ कर ठंडी हवाओं के बीच थी गहमागहमी -
होगा अगला राष्ट्रपति कौन ?
छन रहे थे पुए और पकवान,
बन रहा था पुलाव।
वहीँ दूसरी ओर -
इसी तपिश में,
पेड़ों के नीचे दुबके थे -
रिक्शाचालक, मजदूर और किसान,
अपनी पेट की आग बुझाने को।
नंगी तस्वीर थी भूखी माँ की,
थे चिथड़ों में लिपटे बच्चे -
जो कई शाम से थे निराहार ।
महंगाई की मार ने दी कमर तोड़ ।  
हमे और आपको लगी थी चिंता,
सुखाने की पसीनों की ,
और उन्हें थी चिंता पसीना बहाने की ।
उन बेचारों को था इंतज़ार मुसाफिरों की , कामों की , पैसा कमाने की ।
ताकि बुझा सके पेट की गर्मी को, अपने-अपने परिवारों की,
पूछना  है आपसे एक सवाल -
बाहर की गर्मी है बड़ी या उससे भी बड़ी है पेट की आग?

Tuesday, 12 June 2012

हमारा राष्ट्रपति कैसा हो?


दिखाया आपने सच्चाई का वो रास्ता,
जिस पर चलने से होती है हमारे राजनेताओं का हाल खास्ता।
२१वीं सदी के सबसे बड़े लोकतंत्र का राष्ट्रपति -
भारत का प्रथम नागरिक हो कैसा ?
किया है आपने पुरातन काल को उजागर,
जहाँ थे आदर्शवाद के सुचालक,
नेहरु, राजगोपालाचारी, बल्लभ भाई पटेल।
पर क्या इस तरह चलती थी विवादों से भरी उनकी रेल?
मर्यादा बंधी होती थी उनके आखोँ के पानी के बीच ।
अंतरात्मा की आवाज़ पर बनते थे वोट।
"इमर्जेनसी क्या सच क्या झूठ" के लेखक को गँवानी पड़ी अपनी जान,
कहने की ज़रुरत नहीं आपको,
जानते हैं तब से अब तक का इतिहास ।
सच कहूँ !
विषैले साँप भी इतने विषधर नहीं,
जितनी है राजनीति मैं आज विषैली हमारी सोंच।
होती है बात गाँधी, राजेंद्र, लाल बहादुर, वेंकट रमण, कलाम की ।
सेवा, अर्पण, और समर्पण था जिनका अस्त्र ।
आज आईने में देखे हम सभी खुद को चिढ़ाता है अपना ही चेहरा,
सभ्यता, संस्कृति खोती जा रही है ,
हर क्षण मानव मूल्य और मानवता दे रहा है चेतावनी,
करो मानव मूल्यों की रक्षा -
तभी होगी देश सेवा,
आत्मविश्लेषण, आत्मविवेचन, आत्ममूल्यांकन कर,
उन्हें चुनना हैं भावी कर्णधार को,
जो हमारे देश को बचाएँ डूबता मझधार से
ईश्वर से है- अनंत विनती, प्रार्थना, अर्चना, वंदना,
मिले भारत को एक आदर्श राष्ट्रपति।
 


आएगा ज़रूर एक नया निजाम


भेजा है आपने एक पैगाम
दुनिया को ज़रुरत है एक नए निजाम का सलाम ।
जो सिखाये सबक - आत्मक्रांति की,
जो पढाये  पाठ  श्रम, मानवसेवा की ,
और सुशक्ति के बल पर चलाये समाज को ।
जो गिनाये गिनती -
असफलताओं से भरे समाजसेवी रूपी गणितग्यों की ।
जो घुमाये अपने को विकसित कहने  वाले देशों की ,
नर कंकालों से भरी  हैं खोखली संस्कृति जिनकी,
कहलाने को हैं साम्राज्यवाद , पूंजीवाद, लोकतंत्र के पोषक -
जो खिलने नहीं देते, फूलने नहीं देते , रुपये के मूल्य को ।
मुद्रास्थिति का गुज़रता दौर ,
फैला हैं विश्वरूपी बाज़ार में  ।
बजा रहा है खतरे की घंटी ,
भारत की अर्थव्यवस्था रही है लड़खड़ा ।
लेखक ने किया है  इसे उजागर ,
उनकी जागरूकता के हैं हम शुक्रगुजार ।
पर हूँ, पूर्ण विश्वस्त आएगा सतयुग,
 जो देगा हमें एक नया निजाम ।

Sunday, 10 June 2012

आईना झूठ नहीं बोलता, दिल का हाल खोलता है


जी हाँ ! जो आपके चेहरे पर रंग नहीं जमाता -
शक्ल ख़राब दिखलाई देती है
उस आईने को चकनाचूर कर देते है आप ।
कल जो आईना आपने तोड़ा,
वे आपके चेहरे में असंतुलन बता रहा था।
लोग कहते रहे
दोष आईना का नहीं - आपका है -
आपकी दृष्टि का है।
लोग आपको वास्तविकता से अवगत कराते रहे
पर आप अपनी जिद्द पर अड़े रहे।
आपने एक साल में ही दस आईने बदलने का नया रिकॉर्ड कायम कर दिया ,
नए आईने भी आपको संतुष्ट नहीं कर सके,
सलवटों से भरा चेहरा और भी डरावना दिखाई दिया -
परन्तु आपको कतई पसंद नहीं कि
आईना आपको डराए।
आपने फिर उस आईने को कूड़ेदान में डाल दिया ।
हमने आपको बार -बार समझाया
आईना झूठ नहीं बोलता,
आप आईना बदलते रहे ।
आईना रखने की आदत छूटेगी नहीं
कारण हर क्षण आप उसमें
अपना सुन्दर चेहरा ही देखना चाहते है -
आदत है बचपन की -
आत्ममुग्ध होना, प्रशंसा सुनने की चाहत है।
किन्तु आईना तो आईना है -
मनपसंद रूप को देख कैसे झूठ बोल सकता है?
खुश रहना आपकी आदत है ।
जो आईने आपको चिढ़ाते हैं,
आप उन्हें तत्काल बदल देते हैं।
आपने कभी नहीं सोचा कि आप अपनी सूरत और सीरत को बदलें -
बदलते हैं तो केवल आईना!
पर यह हमेशा याद रखें -
आईना  कभी झूठ नहीं बोलता